सत्य ,साहित्य और समाज....

''सत्य और साहित्य'' समाज के 'महान' व्यक्तित्वों को उभारने तथा 'निर्विघ्नो' को समाप्त करने का एक ''संघर्षिक'' कदम है!

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...फिर वो सामान उठाकर "नंगे पांव" घर को चल दिये !

Posted On: 26 Jul, 2014 Others में

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आज काफी दिनों बाद घर जाना हुआ, बदलाव बदलते-बदलते यहाँ भी पहुच चुका है ! घरो का झुण्ड गाँव में तो पहले ही बदल गया था अब गाँव क़स्बा बन गया है ! बैलगाड़ी की जगह मोटर गाड़ी चलने लगे है, इतवार की जगह सन्डे होने लगा है, बुजुर्ग लोग पहले टहलने जाते थे मगर अब ‘वाक्’ पर जाने लगे है, शहर से काफी कुछ बदलाव इस छोटे से कस्बे में भी ‘इंटर’ का चुका है ! लोग इसे देखकर काफी खुश है, वो इसे ‘इंजॉय’ भी कर रहे है और आगे बढ़ रहे है !

मै भी शाम को दोस्तों के साथ “वाक्” पर निकला, बाज़ार जाकर ‘पानी के बतासे’ खाने की इच्छा हुयी मगर बाज़ार पंहुचा तो लोग इसका नाम भी भूल गए थे, अब यहाँ “पानी पूरी” का चलन हो गया है, कभी एक रुपये के पांच मिला करते थे मगर अब १० रुपये के पांच मिलने लगे है ! फिर भी मन नहीं माना, तो ‘पानी पूरी’ खाकर, बाज़ार की शैर में निकल पड़े ! चलते चलते उस कोने में पहुचे जहाँ से बचपन में ‘स्कूल’ जाया करते थे और ठीक कोने में एक बाबा बैठे रहते थे जिनसे नमस्ते करते थे…
तभी मन हुआ ‘स्कूल’ घूमने चलते है मगर दोस्तों ने बताया स्कूल तो वहां से हटकर कही और पहुच गया है, फिर मन मारकर उसी कोने के सामने खड़े होकर बाते करने लगे. वो कोने वाले बाबा अब भी उसी कोने में बैठे थे, उनसे उसी बचपन वाले अंदाज में नमस्ते किया… और फिर अचानक से दिमाग में एक सोच का समुन्दर बहने लगा…
उस बुजुर्ग बाबा को देखकर मै सहम सा गया, मैने स्कूल से निकलकर कालेज की पढाई कर ली और अब नौकरी भी करने लगा, इन सब में लगभग १५ साल का वक्त तो लग ही गया होगा, मगर बाबा अब बभी वैसे ही है, वही है…
आँखों में मोटे लेंस का चश्मा, जिसके अन्दर से उनकी आँखे भी दिख जाती है जिनसे उनकी आँखों की झुर्रियां साफ़ नजर आती है, कांपते हुए हाथ जो कभी कभी चाय का ग्लास पकड़ते हुए जल भी जाता है, सर पर कुछ सफ़ेद बाल, बदन में सफ़ेद ‘बंडा’ और ‘धोती’…. मगर अब बाबा का सर कमजोरी और बुढ़ापे की वजह से हमेशा नीचे की ओर झुका देखा , नज़रे नीचे नीचे राहगीरों के पैरो पर थी, दिनभर में हजारो पैरो की तश्वीरे उनके रात के सपनो में आती होगी,और बाबा तब भी सोचते होंगे, सब के सब सही है, इनमे से कोई भी मेरे पास नहीं आएगा….फिर अगले दिन उठकर अपना फटा और भरी बैग लेकर उसी कोने में बैठ जाते होंगे और राहगीरों के पैरो को देखने लगते होंगे, और सोचने लगते होंगे की आज किसी एक की चप्पल या जूता तो फटा होगा….आज कोई न कोई तो जरुर आएगा…. कई दिनों से शांत राखी सुई और धागे….आज हाथ में जरुर आयेगे…
मगर इसी सोच में उनके कई और दिन गुजर जाते है…
अब यहाँ सोचना जाहिर है
‘बाबा’ यहाँ, क्यों ? क्यों बैठते है आकर ? क्या जरुरत है इस बुढ़ापे में भी ? आखिर क्या मजबूरी है अब ?
पूरे दिन में कभी कभी उनके पास कोई एक चप्पल या जूता लेकर लेकर आ जाता है, वो भी ऐसी जर्जर हालत में होते है की उस पर आलपिन या घर के सुई धागे का अत्याचार हो चूका होता है… तब भी बाबा उसे पूरे मन से सुधारने में लग जाते है और उसके बाद उन्हें इसके ४-५ रुपये मिल जाते है…
मगर एक दिन में ४-५ रुपये में क्या होता है वो भी कभी कभी, क्या वो यहाँ तक ४-५ रुपये के लिए आते है ? ? ?

बाबा के सामने बैठे मै ये सब सोच ही रहा था की अचानक से एक नवयुवक उनके सामने आकर खड़ा हो गया… बाबा की नज़रे उनके पैर पर ही थी, आधा मिनट तक जब उस नवयुवक ने कुछ नहीं कहा, तब बाबा ने अपनी गर्दन ऊपर उठाते हुए, लड़खड़ाती आवाज में कहा “साहब बताइए क्या सींना है… ?”
सच में अभी तक मैंने इतनी मीठी आवाज नहीं सुनी थी, जहा कोई नहीं आता है, वहां पर भी लोगो को इतनी इज्जत मिलती है ? आजकल वो जमाना नहीं रहा जब लोग घर वालो के जूते चप्पल ‘मोची’ बाबा के यहाँ से सही करवाते थे…. जमाना बदल गया है, ट्रेन से मेट्रो तक लोग आसानी से पहुच गए है, चप्पल जूते टूटने के बाद कोई सिलवाता नहीं है, ऐसे ज़माने में भी बाबा यहाँ आकर क्यों बैठते है, इतने तनाव के बाद भी इतना मीठा कैसे बोल सकते है …………….? कैसे ?

……तभी साहब ने एक थैला देते हुए जबाब दिया बाबा इनको सीं देना… बाबा ने थैला लिया और बिना दाम बताये काम करना शुरू कर दिया… सारा काम करने के बाद जब बाबा ने साहब से पैसे मांगे तो साहब ने उसमे भी बाबा पर झिर्राते हुए ४-५ रुपये कम दिए, और गुस्से से सामान लेकर चले गए….
ये सब देखकर बार बार फिर से वही प्रश्न दिमाग में आ रहा है : वो रोज यहाँ आते क्यों है ? आजकल कौन जूता चप्पल सही कराता है ? किसके पास टाइम है ?…..
खैर इन सब को कौन ध्यान देता है, तेज गति से सबके पैर चले जा रहे है !
शाम का अँधेरा हो रहा था ‘बाबा’ ने समान बांधते हुए भी पैरो को घूरना जारी रखा मगर कोई नहीं आया, एक आशा निराशा में बदली…
फिर वो सामान उठाकर “नंगे पांव” घर को चल दिये…

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